सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा

समस्त जीवों के पितामह, अपने ज्ञान से ब्रह्माण्ड के प्रत्येक स्थूल तथा परा जीव तथा वस्तुओं का निर्माण करने वाले 'पितामह ब्रह्मा जी'। संसार या ब्रह्माण्ड के निर्माणकर्ता, तमो गुण सम्पन्न, सृजन कर्ता।

पालन-कर्ता विष्णु

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालन-हार, पालन-पोषण के कर्तव्य या दाईत्व का निर्वाह करने वाले, सत्व गुण सम्पन्न 'श्री हरि विष्णु'। सृजन के पश्चात तीनों लोकों के प्रत्येक तत्व तथा जीव का पालन-पोषण करने वाले।

संहार-कर्ता शिव

तीनों लोकों में विघटन या विध्वंस के प्राकृतिक लय के अधिष्ठाता, तमो गुण सम्पन्न 'शिव'। वह शक्ति जो ब्रह्माण्ड के प्रत्येक जीवित तथा निर्जीव तत्व के विघटन के कार्यभार का निर्वाह करती हैं।

श्री हरि विष्णु द्वारा वराह अवतार धारण कर रसातल में गयी हुई पृथ्वी को ढूंड निकालना।

प्रजा की सृष्टि हेतु ब्रह्मा जी द्वारा मनु तथा शतरूपा से निवेदन तथा ब्रह्मा जी के नासिका छिद्र से बारह शिशु का प्रकट होना।

ब्रह्मा जी के मानसी-पुत्र स्वायम्भुव मनु तथा उनकी भार्या शतरूपा के प्रकट होने पर, उन्होंने अपने पिता से पूछा! हम आपका कौन सा कार्य करें जिससे आपकी सेवा हो सकें?
ब्रह्मा जी ने मनु से कहा! तुम अपनी भार्या से आपने समान गुणवान संतति उत्पन्न करो, पृथ्वी का धर्म पूर्वक पालन करो तथा नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा भगवान श्री हरि की आराधना करो! प्रजा के पालन से ही मेरी सर्व सेवा पूर्ण होगी। भगवान श्री हरि भी इस प्रकार तुमपर बहुत प्रसन्न होंगे, जिनपर वे प्रसन्न नहीं होते हैं उनका सारा श्रम व्यर्थ रहता हैं क्योंकि यह अपने आत्मा का ही अनादर हैं।
इस पर मनु ने ब्रह्मा जी से पूछा! मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, परन्तु आप मेरी भावी प्रजा के निवास हेतु स्थान प्रदान करें। इस समय जल-प्रलय के कारण समस्त जीवों के आश्रयदाता पृथ्वी जल-मग्न हैं, आप सर्वप्रथम पृथ्वी के उद्धार हेतु कोई प्रयत्न करें। इसपर ब्रह्मा जी चिंतित हो गए और मन ही मन विचार करने लगे की में पृथ्वी का कैसे उद्धार करूँ? पृथ्वी जल में डूब जाने के कारण रसातल में चली गयी हैं। आब तो भगवान श्री हरि ही मेरी सहायता करें, तभी मेरा कार्य संभव हो सकता हैं।

ब्रह्मा जी के नासिका के छिद्र से वराह शिशु का प्रकट होना।

इस प्रकार ब्रह्मा जी मन ही मन विचार कर रहे थे कि! अकस्मात् उनके नासिका के छिद्र से एक अंगूठे के समान आकार वाले एक वराह शिशु उत्पन्न हुआ। देखते ही देखते वह वराह शिशु क्षण भर में हाथी के बराबर के आकर का हो गया, यह देख ब्रह्मा जी तथा उनके पुत्र मनु, सनकादि कुमार, मरीचि इत्यादि मुनि शंका में पड़ कर! नाना प्रकार के विचार करने लगे। ब्रह्मा जी सोचने लगे! कैसा आश्चर्य हैं? अभी-अभी यह वराह शिशु मेरी नासिका से प्रकट हुआ तथा क्षण भर में इतना विशाल आकृति युक्त हो गया। सूकर रूप में यह दिव्य प्राणी! यहाँ किस कारण प्रकट हुए हैं? अवश्य ही भगवान श्री हरि हमें मोहित कर रहे हैं। सभी इस प्रकार सोच रहे थे की भगवान वहां गरजने लगे, उन्होंने अपनी गर्जना से ब्रह्मा तथा उनके पुत्रों को हर्ष में भर दिया। उन्होंने उन भगवान स्वरूपी विशाल आकार वाले सूकर की स्तुति की, जिस देख वे वराह भगवान बहुत प्रसन्न हुए।

रसातल में गई हुई पृथ्वी को भगवान के अवतार 'वराह' द्वारा बहार निकलना तथा हिरण्याक्ष वध।

उन वराह भगवान का शरीर अत्यंत कठोर था, त्वचा पर कड़े-कड़े बाल थे, दाढें बढ़े हुए एवं श्वेत थे। देखते ही देखते वराह भगवान जल में प्रविष्ट हुए, सर्वप्रथम वे पूछ उठाकर बड़े वेग से आकाश में उछलने लगे और अपनी गर्दन के बालों को फटकार कर खुरों के आघात से बादलों को छिटकाने लगे। स्वयं यज्ञ पुरुष होते हुए, वराह रूप धारी श्री भगवान ने अपनी नाक से सूंघ-सूंघ कर पृथ्वी की खोज कर रहे थे; उनकी दाढें बड़ी कठोर थीं तथा वे बड़े क्रूर जान पड़ते थे। श्री भगवान, ब्रह्मा जी तथा मरीचि आदि ऋषियों को बड़े सौम्य दृष्टि से निहारते हुए, वे जल में प्रवेश कर गए थे। जब वे जल में प्रवेश कर रहें थे, उनके विशाल शरीर के कारण मानो समुद्र फट गया था तथा घोर बादलों के गर्जना के समान भीषण शब्द हुआ था। भगवान वराह! पैने खुरों से जल को चीरते हुए अपार जल राशि के पार पहुँचें, वहां उन्होंने समस्त जीवों को आश्रय प्रदान करने वाली पृथ्वी को रसातल में देखा। वास्तव में कल्प के अंत में श्री हरी भगवान ने स्वयं पृथ्वी को अपने उदार पर स्थित कर दिया था। तदनंतर, जल-मग्न पृथ्वी को भगवान ने अपनी दाढ़ों पर धारण कर रसातल से ऊपर उठाया, उस समय उनकी बड़ी शोभा हो रहीं थीं।
जैसे ही वराह भगवान! पृथ्वी को अपने दाढ़ों पर रख कर जल से बहार ला रहें थे, विघ्न डालने के निमित्त हिरण्याक्ष नामक असुर ने जल के भीतर, उनपर गदा से आक्रमण कर दिया। वराह भगवान इस पर अत्यंत क्रोधित हो गए तथा उन्होंने हिरण्याक्ष को मार डाला। अपने श्वेत दाँतों की नोक पर पृथ्वी को धारण कर! वे जल से बहार आयें एवं उस समय उनका वर्ण तमाल के समान नील वर्ण का था। ब्रह्मा जी सहित उनके पुत्रों ने उस समान भगवान वराह की वेद-वाक्यों से स्तुति की।

ऋषियों द्वारा भगवान वराह की स्तुति तथा पृथ्वी को पुनः स्थापित करना।

तदनंतर, ऋषियों ने भगवान वराह की स्तुति-वन्दना की! अजीत भगवान आपकी जय हो! आप अपने वेदत्रयी रूप को फटकार रहे हैं, आपके रोम-कूपों में सम्पूर्ण यज्ञ लीन हैं! त्वचा गायत्री आदि छन्द हैं! रोमावली कुश! नेत्र घृत! चारों चरण होता, अध्वर्यु, उद्गाता तथा ब्रह्मा हैं! आपकी जय हो। आपने पृथ्वी का उद्धार करने के निमित्त ही सूकर या वराह रूप धारण किया हैं। आपकी थूथनी में स्त्रुक् हैं, नासिका के छिद्र में स्त्रुवा हैं, उदार में इडा हैं, कानों में चमस हैं, मुख प्राशित्र हैं तथा कंठ छिद्र सोमपात्र हैं। आप जो चबाते हैं वही अग्निहोत्र हैं; गर्दन तीन इष्टियां हैं, दोनों दाढें दीक्षा के बाद की इष्टि और यज्ञ समाप्ति की इष्टि हैं, जिह्वा महावीर नामक कर्म हैं, सर! होम रहित अग्नि और औपासनाग्नि हैं, प्राण! चिति हैं, आपके वीर्य में सोम हैं; आसन प्रातः सवनादि तीन सावन हैं, सातों धातु अग्निष्टोम, अत्यग्नीष्टोम, उक्थ, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम नामक सात संस्थाएं हैं तथा सत्र सम्पूर्ण शरीर के अंग हैं। यज्ञ अनुष्ठान रूपी इष्टियां नाना अंगों को मिलाने वाली मांस पेशियाँ हैं, समस्त कर्म, देवता, द्रव्य और यज्ञ आपके कर्म हैं, आपको नमस्कार हैं। पृथ्वी को धारण करने वाले भगवान आपकी दाढ़ों की नोक पर पड़ी हुए पृथ्वी ऐसे सुशोभित हो रहीं हैं, जैसे वन से निकल कर बहार आयें हुए गजराज के दांतों पर रखे हुए कमल का पुष्प हो। आपके दांतों पर रखे हुए पृथ्वी सहित आपका यह विग्रह पर्वत शिखरों पर छाई हुई मेघ जैसे सुशोभित हो रहीं हैं। कृपा कर आप, समस्त जीवों के सुखपूर्वक रहने हेतु पृथ्वी को जल पर स्थापित कीजिये, हम आपको तथा पृथ्वी माता को प्रणाम करते हैं।
ऋषियों द्वारा स्तुति करने पर भगवान वराह ने अपने खुरों से जल को स्तंभित कर, उसपर पृथ्वी को स्थापित कर दिया; इस प्रकार रसातल से पृथ्वी को निकलने के पश्चात श्री हरी भगवान अंतर्ध्यान हो गए।

हिरण्याक्ष के सन्दर्भ में; कश्यप जी की पत्नी दिति का संध्या काल में कामातुर हो पुत्र प्राप्ति हेतु समागम करना।

पूर्व काल में एक समय की बात हैं! दक्ष कन्या दिति पुत्र प्राप्ति की इच्छा से कामातुर हो संध्या काल में अपने पति! मरीचि के पुत्र कश्यप जी से निवेदन करने लगी। उस समय कश्यप जी संध्या कर्म में व्यस्त अग्नि शाला में थे। दिति ने कश्यप जी से कहा! मतवाला हाथी जैसे केले के वृक्षों को मसल डालता हैं, उसी प्रकार कामदेव मुझे उद्विग्न कर रहें हैं। अपनी सौतों को देखकर मुझे बड़ी ईर्षा होती हैं; कृपा कर आप मुझ पर कृपा करें जिससे में भी संतानों की माँ बन सकूँ। एक दिन पिता जी! (दक्ष प्रजापति) ने हम सभी बहनों से पूछा कि! तुम सभी किसे अपना पति बनाना चाहती हो? उन्होंने हम सभी तेरह बहनों का भाव जानकर, सभी का विवाह आपके साथ कर दिया, आप मेरी इच्छा पूर्ण करें।
दिति काम वेग के आधीन होकर उद्विग्न हो रहीं थीं, इस पर विवश हो कश्यप ऋषि ने कहा! मैं तुम्हारी संतान प्राप्ति की इच्छा को यथाशक्ति अवश्य ही पूरा करूँगा तुम एक मुहूर्त प्रतीक्षा करो, नहीं तो ज्ञानी जन मेरी निंदा करेंगे। यह घोर समय रक्षासादि, भूत-प्रेत इत्यादि घोर जीवों का हैं, इस समय भगवान भूतनाथ के गण विचरण किया करते हैं। इस समय वे अपने गणो भूत-प्रेतों के साथ विचरण करते हैं, जिनका जटाजूट श्मशान भूमि से उठे हुए धूल के समान हैं, जिनके कांतिमय शरीर में भस्म लगी रहती हैं। तुम्हारे वे बहनोई महादेव जी! सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि समान तीन नेत्रों से सभी को देखते रहते हैं। विवेकशील पुरुष अविद्या के अन्धकार को हटाने की इच्छा से उनके निर्मल चरित्र का गान करते हैं, उनके समान और कोई नहीं हैं, केवल मात्र सत्पुरुष ही उन तक पहुँच पाता हैं। पति कश्यप के इस प्रकार समझाने पर भी, कामातुर दिति ने निर्लज्ज हो वस्त्र त्याग कर उन्हें पकड़ लिया; इस पर उन्होंने देवों को प्रणाम कर! एकांत में अपनी भार्या के संग समागम किया। अंततः दिति को बहुत अधिक लज्जा आयी तथा अपने पति कश्यप के पास जा कर बोलीं!
मैंने भूतों के स्वामी भगवान भूतनाथ शंकर के प्रति अपराध किया हैं, मैं उग्र तथा रुद्र रूप महादेव शंकर को नमस्कार करती हूँ। वे सत्पुरुषों हेतु कल्याणकारी तथा दुष्टों के लिए क्रोध मूर्ति दंडपाणि हैं। स्त्रियों पर तो व्याघ्र भी दया रखते हैं, फिर वे सति-पति मेरे बहनोई, परम कृपालु! मेरे ऊपर कृपा करें। कश्यप मुनि ने संध्या वंदना कर देखा! दिति कांपते हुए अपने संतान की लौकिक तथा पारलौकिक उन्नति तथा रक्षा के लिए प्रार्थना कर रहीं हैं।

कश्यप जी का अपनी भार्या दिति को गर्भ रक्षा हेतु उपदेश तथा संतान का भविष्य कथन।

कश्यप जी ने कहा! वह समय उपयुक्त नहीं था एवं तुमने मेरे किसी भी बात पर ध्यान नहीं दिया, देवताओं की अवहेलना की। अमंगल चंडी तुम्हारे कोख से दो बड़े भीषण अमंगल तथा अधम पुत्र उत्पन्न करेगी; जगदीश्वर श्री विष्णु के हाथों तुम्हारे पुत्रों की मृत्यु होगी। इस पर दिति ने कहा! यह तो में भी चाहती हूँ! मेरे पुत्रों का कोई वध साक्षात् श्री हरि विष्णु ही करें। कश्यप जी ने कहा! तुम्हें अपने किये पर पश्चाताप हैं! तथा शीघ्र ही उचित तथा अनुचित का ज्ञान भी हो गया हैं। तुम्हारा शिव, ब्रह्मा, विष्णु तथा मुझ पर आदर भाव हैं, तुम्हारे पुत्रों में एक ऐसा भी होगा जिसका सत्पुरुष भी मान करेंगे तथा जिसके यश को भगवान के गुणों के समान समझा जाएगा जायेगा।

सनकादि कुमारों का वैकुण्ठ जाना तथा जय तथा विजय को श्राप देना।

एक दिन सनकादि कुमार भ्रमण हेतु बैकुंठ गए, उन्हें देख भगवान विष्णु के द्वारपाल तथा पार्षद जय तथा विजय ने उनसे कुछ रोष-पूर्ण बातें कहीं; जिससे कुपित होकर कुमारों ने उन्हें पृथ्वी पर जन्म धारण कर, नाना कष्ट भोगने का अभिशाप दे दिया। श्राप के कारण जय तथा विजय! प्रथम जन्म में हिरण्याक्ष तथा हिरण्यकश्यपु, द्वितीय जन्म में रावण तथा कुम्भकर्ण तथा तृतीय जन्म में शिशुपाल तथा दन्तवक्र बने।दैत्य उत्पत्ति के सम्बन्ध में अधिक जाने

हिरण्याक्ष दैत्य का युद्ध हेतु उद्धत हो समुद्र में जा घुसना, वरुण देव की पुरी में जा युद्ध हेतु ललकारना तथा भगवान विष्णु का वराह अवतार में अपने दाढ़ों के नोक पर उठाये हुए पृथ्वी सहित पीछा करना।

दिति के दोनों पुत्र या दैत्य अत्यंत कठोर शरीर तथा घोर आकृति युक्त हो पूर्ण पराक्रम से प्रकट हो गए, १०० वर्षों तक उनका पालन पोषण माता दिति के गर्भ में हुआ था। कश्यप ऋषि ने उन दोनों का नाम करण किया, एक का नाम हिरण्यकशिपु जो दिति के प्रथम पुत्र थे तथा दूसरे का नाम हिरण्याक्ष रखा गया। हिरण्यकशिपु, ब्रह्मा जी से वर प्राप्त करने के पश्चात बड़ा ही उद्धत हो गया था। उसने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अपना अधिकार कर लिया। हिरण्याक्ष को वह बहुत चाहता था; एक दिन हिरण्याक्ष हाथ में गदा लिए युद्ध का अवसर खोजते हुए स्वर्ग पर गया, वह सर्वदा निरंकुश तथा निर्भय हो विचरण किया करता था। उसे देखकर समस्त देवता इधर-उधर छुप गए, इस पर वह दैत्य बड़ी जोर-जोर से गर्जना करने लगा। तदनंतर वह दैत्य जल क्रीडा करने के निमित्त समुद्र में घुस गया, जिस कारण जल में बड़ी-बड़ी लहरे उठ रहीं थीं। उसके इस कृत्य पर समुद्र में स्थित वरुण देव के सैनिक घबरा कर दूर भाग गए, महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षों तक समुद्र में घूमता रहा। इस प्रकार वह दैत्य वरुण की राजधानी विभावरी-पूरी में जा पहुंचा। वहां पाताल के स्वामी तथा जलचरों के अधिपति वरुण जी से! हंस कर नीच मनुष्य की तरह प्रणाम किया। दैत्य ने वरुण से कहा! जो लोग अपने आपको वीर समझते हैं, आप उनका मर्दन कर चुके हैं और एक बार आपने संसार के समस्त दानवों को जीत कर राजसूय-यज्ञ भी किया था। उसने वरुण से युद्ध करने की इच्छा प्रकट की! इस पर वरुण को क्रोध तो बहुत आया किन्तु वे उसे अपने बुद्धि से शांत कर गए। उन्होंने हिरण्याक्ष से कहा! भाई! अब हमें युद्ध में कोई रुचि नहीं हैं, भगवान पुराण-पुरुष के सिवा हमें कोई और ऐसा नहीं दिखता हैं, जो तुम जैसे वीर योद्धा को युद्ध में संतुष्ट कर सकें, तुम उन्हीं के पास जाओ! इस पर दैत्य राज बड़ा प्रसन्न हुआ।

हिरण्याक्ष ने शीघ्र ही नारद जी का पता लगाया तथा उनसे श्री हरि का पता लगाकर रसातल में पहुँच गया। वहां उसने भगवान श्री हरि विष्णु को वराह रूप में अपनी दाढ़ों की नोक पर पृथ्वी को रख कर ले जाते हुए देखा। उन्हें देखकर हिरण्याक्ष खिल-खिला कर हंस पड़ा और कहने लगा! अरे यह जंगली पशु यहाँ जल के भीतर कैसे आया? अरे इधर आ इस पृथ्वी को छोड़ दे, इसे ब्रह्मा जी से रसातल वासियों को दे दिया हैं। सूकर रूप धारी सुरधम! मेरे रहते हुए तू यहाँ से पृथ्वी को नहीं ले जा सकता हैं। तू माया से युक्त हो लुक-छिप कर दैत्यों को मार देता हैं, तेरा बल तो योगमाया शक्ति ही हैं! तुझमें और कोई पुरुषार्थ नहीं हैं। आज तुझे मारकर में अपने बंधुओं का शोक सर्वदा के लिए दूर कर दूंगा, मेरे हाथों मारे जाने के कारण देवता और ऋषि अपने आप नष्ट हो जायेंगे। भगवान श्री हरि विष्णु उसके दुर्वचन पर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया न देते हुए, जल से बहार निकल आने लगे, इस पर दैत्य ने उनका पीछा किया और कहने लगा! तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? वैसे भी असत् पुरुषों के लिए कौन सा काम करने योग्य नहीं हैं।

भगवान श्री हरि विष्णु के वराह अवतार का हिरण्याक्ष के संग युद्ध तथा मृत्यु।

भगवान श्री हरि विष्णु ने पृथ्वी को ले जाकर जल के ऊपर व्यवहार योग्य स्थान में स्थित कर दिया और उसमें अपनी आधार शक्ति का संचार किया। श्री हरि विष्णु ने अपने हाथ में गदा लिए पीछे से आ रहे हिरण्याक्ष को क्रोध पूर्वक हँसते हुए कहा! वीर पुरुष तुझ जैसे मृत्यु-पाश में बंधे हुए जीव आत्मा पर ध्यान नहीं देते हैं। भगवान श्री हरि विष्णु ने जब हिरण्याक्ष का खूब उपहास किया, वह क्रोध से सर्प से समान तिलमिला उठा तथा उसने भगवान पर गदा से प्रहार किया। हिरण्याक्ष तथा श्री हरि विष्णु के वराह अवतार में बड़ा घोर गदा युद्ध छिड़ गया, दोनों एक दूसरे को जितने की इच्छा से युद्ध करने लगे। युद्ध करते-करते श्री हरि विष्णु को आभास हो गया की हिरण्याक्ष बड़ा वीर योद्धा हैं, उसमें भय का नाम भी नहीं हैं और उसके पराक्रम को चूर करना बड़ा कठिन हैं! तब ब्रह्मा जी नारायण जी से इस प्रकार कहने लगे!
मुझसे वर प्राप्त कर यह दैत्य बड़ा प्रबल हो गया हैं, यह महा-कंटक अपने बल तथा पराक्रम के अनुसार युद्ध करने की इच्छा से समस्त लोकों में घूम रहा हैं। आप शीघ्रता से अपनी योगमाया को स्वीकार कर इस पापी को मार डाले, इसकी मृत्यु आपके हाथों से होनी हैं। भगवान श्री हरि विष्णु ने अपने हाथों में सुदर्शन चक्र धारण किया, जब हिरण्याक्ष ने देखा की भगवान ने सुदर्शन चक्र धारण किया तो क्रोध से वह तिलमिला उठा। उसने गदा तथा त्रिशूल से वराह भगवान पर आक्रमण किया, परन्तु अपने सुदर्शन चक्र से भगवान ने गदा तथा त्रिशूल को काट दिया। इस पर हिरण्याक्ष ने अपनी माया जाल का भगवान वराह पर प्रयोग किया, एकदम से बहुत तेज आंधी चलने लगी! जिससे अन्धकार तथा धुल चारों ओर छा गया। सभी दिशाओं से पत्थरों की वर्ष होने लगी, बिजली चमकने लगी, गरज के साथ बादल घिर आयें, सूर्य इत्यादि ग्रह छिप गए, निरंतर पीब, केश, रुधिर, विष्ठा, मूत्र और हड्डियों की वर्षा होने लगी। बड़े-बड़े पर्वत दिखाई देने लगे, साथ ही जो नाना प्रकार के अस्त्र-शास्त्र वर्षा रहे थे, हाथों में त्रिशूल तथा अस्त्र-शास्त्र धारण की हुई राक्षसियां दिखने लगी और भी नाना प्रकार के माया जाल का हिरण्याक्ष ने आश्रय लिया।
हिरण्याक्ष के आसुरी माया जाल का नाश करने हेतु भगवान वराह ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग किया। तब वह दैत्य! भगवान वराह के पास आया तथा उन्हें अपनी भुजाओं पर भर कर वज्र के समान मुक्के मरने लगा। इस पर भगवान वराह ने हिरण्याक्ष को एक ऐसा तमाचा मारा जिससे वह निष्प्राण हो पृथ्वी पर गिर गया तथा उसकी मृत्यु हो गई।

वराह अवतार
वराह अवतार
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वराह भगवान, हिरण्याक्ष का वध करते हुए
वराह भगवान, हिरण्याक्ष का वध करते हुए
वराह भगवान की मनोरम पाषण मूर्ति
वराह भगवान की मनोरम पाषाण मूर्ति
वराह अवतार
वराह अवतार


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